Saturday, March 15, 2008
मुझे खोने से डरता था
मेरी बातों पे हँसता था
नाजाने शख्स था वो कैसा
मुझे खोने से डरता था
मुझे जब भी वो मिलता था
यही हर बार कहता था
सुनो !!!!!
अगर मैं भूल जाऊं तो,
अगर मैं रूठ जाऊं तो
कभी वापिस न आऊं तो
भुला पाओगे ये सब कुछ
यूँही हँसती रहोगी क्या
यूँही सजती रहोगी क्या
यही बातें हैं बस उसकी
यही यादें हैं बस उसकी
मुझे इतना पता है बस ……!
मुझे वो प्यार करता था ,
मुझे खोने से डरता था!!!!!!!!!!!!!!
Saturday, March 1, 2008
प्रतीक्षारत हूँ !!!!!!
Friday, February 1, 2008
छेड़छाड़- एक प्रसंग.
छेड़-छाड़ उस विधा का नाम है जिसे बेटा बिना बाप के सिखाये सीख जाता है.मूछों की रेखा आयी नही की बच्चा छेड़-छाड़ शास्त्र में उलझ जाता है.छेड़ने की पर्यायवाची: क्या माल है ,क्या कमर है,क्या चलती है, आती क्या खंडाला आदि .फसलों की किस्मों की तरह छेड़ छाड़ की की भी काफी किस्म होतीं हैं.जैसे बजारू छेड़ छाड़ ,घरेलू छेड़ छाड़ ,दफ्तरी छेड़ छाड़,जीजा साली छेड़ छाड़ ,फिल्मी छेड़ छाड़ ,साहित्यीक छेड़ छाड़ ,ब्लोगिंग छेड़छाड़ वगैरह, वगैरह.
वैसे मुझ खाकशार को छेड़छाड़ पर कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है.छेड़छाड़ की परम्परा आदिकाल से ही चली आ रही है.आदम ने हब्बा को छेडा परिणाम आज की सृष्टि .सपुर्न्खा ने राम लक्ष्मण को छेडा परिणाम सपुर्न्खा की नाक कटी.रावण ने सीता को छेडा परिणाम ,रावण का नाश हुआ.और आगे बढें तो द्वापर के सबसे बडे छेडैया कृष्ण जी हुए.पनघट पे गोपियों को छेडा और अनंत काल तक छेड़ते रहे परिणाम ये हुआ की गोपियों ने उनकी गैईया को चराने से मना कर दिया.
अब आया कलजुग जिसमे छेड़छाड़ ने काफी विकास किया.महाराणा प्रताप ने अकबर को छेडा,शिवाजी ने औरंगजेब को छेडा.गांधी जी ने अंग्रेजों को छेडा, विकसित देश विकाशील देशों से छेड़ छाड़ कर रहे हैं, पडोसी पडोसी से छेड़छाड़ कर रहा है.राजनितिक दल आपस में छेड़ छाड़ कर रहे हैं.सरकार जनता से छेड़छाड़ करती है,और हाँ, जनता भी पांच वर्षों में एक बार सरकार से ऐसा छेड़छाड़ करती है की सरकार चारो खाने चित्त.हिन्दी चिटठा पुरस्कार कमिटी ने २००७ की पुरस्कृत ब्लागर ममता जी को छेडा परिणाम ये हुआ की ममता जी ने पुरस्कार ही लेने से मना कर दिया .
छेड़छाड़ का प्रसिद्ध मौसम "फागुन " माना जाता है.वैसे मकर संक्रान्ति से सीजन शुरू हो जाता है फिर वसंत पंचमी और होली पर तो छेड़छाड़ एक राष्ट्रीय कार्यक्रम की तरह हो जाता है.फिर आता है मई-जून जिसमे छेड़छाड़ अपने चरम पे होता है.क्युकी ये शादी व्याह का मौसम हो जाता हैं,इसमे खूब छेड़ छाड़ चलती है.
जहाँ तक बात है दफ्तरी छेड़छाड़ की,अगर अप्रैसल के टाईम बॉस छेड़छाड़ कर दे तो एम्प्लोयी बेचारा फिर एक साल तक रोता है.कभी कभी छेड़छाड़ रूपी अस्त्र तबादले के लिए भी किया जाता है. बॉस जब महिला कर्मचारी को छेड़ता है तो क्या बात.बॉस उन्हें अपने केबिन में बुलाता है,काफी पिलाता है,फिर शाम को उन्हें पिक्चर और डिनर के लिए आमंत्रित करता है और कुछ दिनो बाद महिला का प्रमोशन हो जाता हैं.
खैर छेड़छाड़ पर लिखते रहे तो ये अद्ध्याय कभी खत्म नही होगा.हम प्राईवेट नौकरी वाले तो साल भर छेड़छाड़ करते रहते हैं, न करें तो खाएं क्या? कभी कोडिंग से छेड़छाड़ ,कभी अल्गोरिथम से छेड़छाड़ ,कभी एस.डी.एल.सी से छेड़छाड़, कभी प्रोजेक्ट मैनेजर से छेड़छाड़ ,कभी एच.आर . से छेड़छाड़.........कभी खुद से छेड़छाड़!!!
Sunday, January 27, 2008
विल्स नेविकट और खड-खाना
उन्होने मुश्काराकर कहा “अबे यार !शादी में गया था न !! रोहिणी ,वही से जुगाड़ हुआ .लेकिन यार आते आते मैंने एक और डिब्बी पर हाथ फेरना चाहा पर फिसल गयी.फिर तिवारी जी पुलाव,शाही पनीर,टिक्की मसाला आदि के किस्से सुनाया .बहुत भीड़ हो गयी थी लोग छिना झपटी कर राहे थे.फिर रात के २ बजे तक हम लोग काफी बातचीत किये आज के बफे (खड खाने ) और व्यवस्था पर.
आज देश का बढियां खाना कुत्तों के पेट में जा रहा है.क्यों की बड़ी पार्टियों ,डिनरों, शादी व्याह में खडे खडे खाने का रिवाज़ है.पर आज तक यह समझ में नही आया की इस देश में कुर्सियों की ऐसी कौन सी बड़ी कमी आ गयी जो लोग बाग़ बैठकर खाना नहीं खा सकते.देख कर ऐसा लगता है की जैसे लोग प्लेट लेकर भोजन समेत घर भाग जायेंगे. ऐसे में अगर कान खुजलाना हो या सरकता हुआ चश्मा ठीक करना हो तो समस्या !!! एक हाथ में नेप्किन और प्लेट दूसरे में चमचा .तीसरा हाथ भगवान् ने दीया नहीं.मजबूरन पास गुजरते लोगो से कहना पड़ता है.भाई साहब जरा मेरा कान खुजला दीजिये या चश्मा सरका दीजिये . लोग बाग़ खाली प्लेट ले कर ऐसे इधर उधर टहलते हैं जैसे सूट पहन कर भीख मांगने जा रहे हो.
एक अजीब दृश्य होता है "बफे उर्फ़ खड खाने " का. हर आदमी ओलम्पिक खिलाडी की तरह इस लालच में उछलता है की सीधे पकवान के डोंगे पर जा कर गिरे और अपनी प्लेट में पहाड़ समेत ले.ऐसे मौके पर महिलाओं का कौशल देखने योग्य होता है.पहले अपने निजी उपलब्धियों (बच्चो ) को आगे ठेलती हैं ,फिर उनकी सुरक्षा के बहाने खुद डोंगे पर हावी हो जाती हैं .साथ साथ यह भी दोहराती जाती हैं की उनका कुछ खाने का मूड नही है...खाने की आपाधापी को देख कर ऐसा लगता है की लोग जिंदगी में पहली बार खाना खा रहे हों.खड खाने की लड़ाई में जो लोग विजयी होते हैं उनके प्लेट में लड़ा माल देख कर ऐसा लगता है की ये लोग अब चार पाच दिन तक खाना नही खाएँगे.
फिर कुछ देर बाद लोग खाने पर अपनी राय प्रस्तुत करते हैं.अरे मिश्र जी " शाही पनीर तो लाजवाब थी पर थोडी तीखी हो गयी थी.पूरियां थोडी जल गयी थी.मिश्रा जी आपने गोल गप्पे खाया था ? नही! मिश्र जी आश्चर्य से बोलते हैं .अमा यार ,शाही पनीर के राईट हैण्ड को दस कदम आगे बढ़ने पर मशरूम का डोंगा था ,उससे लेफ्ट को पुलाव के रास्ते हो कर स्ट्रेट जाने पर गोल गप्पे थे. ..............
Monday, January 21, 2008
उसे जब याद आएगा की सावन लौट आया है

उसे जब याद आएगा की सावन लौट आया है .
बुला लेगा वो मुझको या खुद ही लौट आएगा .
उसे जब याद आयेगा मैं कैसे मुस्कुराता था
तो आंखें मुस्करायेंगी , या दामन भीग जायेगा ,
उसे जब याद आयेगा मैं कैसे नाम लेता था
तो मेरा नाम लिखेगा , या अपना भी मिटायेगा,
उसे जब याद आएगा मेरा खामोश सा रहना
तो सब को बोल देगा वो या खुद से भी छुपाएगा ,
उसे जब याद आएगा मेरा नंगे सर फिरना
तो बिजली बन के कड़के गा , या बादल बन के छायेगा
उसे जब याद आएगा मेरा चलना , मेरा फिरना
तो राह में खार बोयेगा , या फिर पलकें बिछायेगा .
उसे जब याद आएगा .......................
Wednesday, January 16, 2008
तुने होंठों को लरज़ने से तो रोका होता?
तुने होंठों को लरज़ने से तो रोका होता
बे-नियाजी से, मगर कंकपाती आवाज़ के साथ
तुने घबरा के मेरा नाम न पूछा होता
तेरे बस में थी अगर मशाल -ऐ -जज्बात की लौ
तेरे रुखसार में गुलज़ार न भड़का होता
यूं तो मुझ से हुई सिर्फ़ आब -ओ -हवा की बातें
अपने टूटे हुए फिकरों को तो परखा होता
यूं ही बे-वजह ठि-ठाकने की ज़रूरत क्या थी
दम -ऐ -रुखसत में अगर याद ना आया होता
तेरा अंदाज़ बना ख़ुद तेरा दिले -दुश्मन
दिल ना संभला , तो कदमों को संभाला होता
अपने बदले मेरी तस्वीर नज़र आ जाती
तुने उस वक़्त अगर आईना देखा होता
हौसला तुझ को ना था मुझ से जुदा होने का
वरना काजल तेरी आंखों में ना फैला होता .
Tuesday, January 15, 2008
Sunday, January 13, 2008
ममता जी ने सही किया या गलत.?
पुरस्कारों और विवादों में हमेशा चोली दामन का साथ रहा है.२००७ की पुरस्कृत ब्लागर ममता जी ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया.जैसा की उन्होने कहा की-.–
हमने ब्लॉगिंग शुरू की थी तो सिर्फ अपनी ख़ुशी के लिए न कि किसी पुरस्कार प्राप्ति के लिए।जिस दिन हमें इस पुरस्कार के बारे मे पता चला था उस दिन हमे ख़ुशी और आश्चर्य दोंनों हुआ था।और जहाँ ख़ुशी और आश्चर्य होता है वहां दुःख भी होता है । ख़ुशी हमें इस लिए हुई थी कि हमारे ब्लॉग को इस लायक समझा गया कि उसे पुरस्कार के लिए चुना गया और आश्चर्य इस बात का था कि हमारा ब्लॉग कैसे और क्यूँ चुना गया और दुःख इस बात का हुआ जिस तरह हमारा ब्लॉग चुना गया ।
अब राम जाने की वो महिला होने के नाते अपनी इगो की वज़ह से पुरस्कार ठुकरा दिया या इस गन्दी राजनीति से आहत हुईं. इसके इतर ममता जी एक ससक्त ब्लोगर रहीं है ,खाश कर के मेरी पसंदीदा ब्लोगर .इनके लेखन में कोई बनावटीपन नहीं रहता बिलकुल सही और सटीक लिखतीं है.जैसा की पुरस्कारों का एलान करते हुए जो पोस्ट लिखी गई थी, उनके चिट्ठे को चुनने के पीछे जो भी कारण दिए गए थे, उससे बढ़िया और कोई आधार नहीं हो सकता था ।हाँ अगर ममता जी यह सोचतीं है कि महिला के नाम पर कृपा के रूप में दिया गया है तो अलग बात है.
कुछ लोगो का मानना है की यह एक घटिया राजनीती का नतीजा है,जैसा की पंकज जी ने कहा की "काश बाकी विजेता भी निज स्वार्थो से उठकर ममता जी की तरह साहस दिखा पाते। यदि ऐसा होगा तो सम्मान की राजनीति और सम्मान की दुकान चलाने वाले दोनो ही जड से उखड जायेंगे। दरअसल यह सब मील का पत्थर साबित होगा और आगे की पीढी याद करेगी कि कैसे खुले मन वाले ब्लागरो ने टुच्चे साहित्य माफिया को धूल चटायी थी।कैसे सब कुछ बढिया चल रहा था छोटे से ब्लाग परिवार मे इस गन्दी सम्मान राजनीति के आने से पहले। मैने पहले ही चेताया था और इसीलिये आवेदन ही नही किया था। आशा है आगे ऐसे सम्मानो से पहले दुकानदार दस बार सोचेंगे।""
खैर आप के क्या विचार हैं.ममता जी ने सही किया या गलत.?
Friday, January 11, 2008
कारवां के साथ रहकर मैं अकेला ही रहा
आ रही है सांझ लेकिन पथ चूका लगता नहीं.
कारवां के साथ रहकर मैं अकेला ही रहा ,
ठौर तो मिलते रहे पर घर मिला लगता नहीं.
बीज थे संकल्प के वट-वृक्ष बनने के लिए.
रीढ़ में थी ग्रंथियां यह तन तना लगता नहीं.
बोझ थी यह जिंदगी कुछ बोझ औरों का रहा,
झुक रही सीधी कमर पर सिर झुका लगता नहीं.
प्रश्न चिन्हों में उलझकर रह गए उत्तर सभी,
है यथावत आज भी यह भ्रम मिटा लगता नहीं.
बूँद थे हम बूँद बनकर हर पहर रिसते रहे ,
पूर्ण कब थे कब घटे यह घट भरा लगता नहीं.
बज रहीं शहनाइयां इस मातमी माहौल में
त्रासदी युग की विकट यह स्वर बुरा लगता नहीं।
हिन्दी कविता
Tuesday, January 8, 2008
बारह में से चार गए ?
खैर,बोस अन्दर आये ,और पूछा की "राज ४ प्रोजेक्ट्स थे २ तो फाईनल हो गए ,अभी बचा कितना? पता नही वो नींद में थे की मैं .उनको ये भी नही पता ४ में से २ गए तो बचा कितना.मेरा तो ये मन किया की बोल दे की "सिर ४ में से २ गया तो कुछ नही बचा.
ऐसे ही एक बार बादशाह अकबर अपने दरबारियों के से पूछा की "बारह में से चार गए तो क्या बचा"?
कई दरबारियों ने बेसाख्ता बोला "आठ" .
बादशाह से ने उचित उत्तर न पाकर बीरबल से वही प्रश्न दोहराया .
तब बीरबल ने कहा - जहाँपनाह,बारह में से चार गए तो कुछ भी नही बचा.
साबित करो-अकबर ने कहा.
"जहाँपनाह ,वर्ष में बारह महीने होते है .उन बारह महीनों को हम जाडा, गर्मी ,बरसात के रूप में चार-चार महीनों में बाट लेते है.अगर इसमे से बरसात के चार माह निकाल दिए जाएँ तो कुछ भी नही बचेगा.कूंये , तालाब सूख जायेंगे .फसलें लह-लहा न पायेंगी -सब कुछ सूख जायेगा.इसीलिए मैंने कहा की कुछ भी नही बचेगा...एक बार फिर बाजी मार ले गए बीरबल.
Saturday, January 5, 2008
सुनो तुम लौट आओ ना!
वो देखो चाँद निकला है
सितारे जगमगा रहे हैं
हमारी मुन्तजिर आंखें
दुआएं मांगती आंखें
तुम्हें ही सोचती आंखें
तुम्हें ही ढूँढती आंखें
तुम्हें वापिस बुलाती हैं
ये दिल जब भी धड़कता है
तुम्हारा नाम लेता है
ये आंसू जब भी बहते हैं
तुम्हारे दुख मैं बहते हैं
ये बारिश जब भी होती है
तुम्हें याद करती है
खुशी जो कोई आयी भी
तुम्हारे बिन अधूरी है
सुनो!!!! तुम लौट आओ ना !!!!!!!
Hindi
Wednesday, December 19, 2007
जरा सी बात है मुँह से निकल न जाये कही
जरा सी बात है मुँह से निकल न जाये कही,
वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है ,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाये कही।
यों मुझको खुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन ,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाये कही ।
तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है ,
तमाम उम्र नशे में न निकल जाये कही,
कभी मचान पे चढ़ने कि आरजू उभरी ,
कभी ये डर के ये सीढ़ी फिसल न जाये कहीं ।
ये लोग होमो हवन में यकीन रखते है
चलो यहाँ से हाथ जल न जाये कही । ।
हिन्दी
Saturday, November 24, 2007
एक सपना
प्यारा सा सपना ,
जिसमे है सिर्फ मैं और मेरी दुनिया ,
मेरी दुनिया कि छोटी-छोटी खुशियाँ ,
फूलों की रंगिनिया , खुशबू भरी कलियाँ ,
समेट लेना चाहता हूँ मैं ,
सभी सुखो कि अनुभूतियों को ,
सारे जहाँ के प्यार भरी मुस्कान को ,
पर क्या ?
इस बनावटी दुनिया में रहकर
कभी यह मेरा "सपना "
सच हो पायेगा ?!!!
Tuesday, November 20, 2007
कशमकश
कदम तेरे बढ़ रहे थे ,यूं कशमकश में फँसे हुए ,
अजब थी हालत थी तेरी ,जैसे कि बस में न हो दिल तेरा ,
कभी गुमसुम सी लगती थी तुम,कभी मायूस सी ,
चेहरे पे लटकती ये बेपरवाह लटें ,कितनी मासूम हो तुम !!!
सोचता रह रात भर ,कि पूछूं परेशानी तुम्हारी ,
पर डर गया इस डर कि कही और ना परेशान कर दूं तुम्हे ,
इस भोले से चेहरे पर अच्छी लगती है ,लकीरे सिर्फ मुस्कराहट कि ,
अपनी रंजिशे ,मुश्किलें ,हमे दे दो ,
लेकिन खुश रहा करो ....मेरे लिए !!
पहले कि तरह ..................................!!!
Saturday, November 17, 2007
लालू ,"हरा पेड़ चर्र्र्र्र्र्र्र्र्रा से गिर गया ,ट्रांसलेशन करो ?"
एक बार राजू ने एक सपना देखा कि , हमारे देश के तीन नेता ,श्री मनमोहन सिंह,अटल जी ,और लालू जी ,तीनो गुजर गए ,और इनकी आत्मा स्वर्ग में गयी ,तो जैसा कहा जाता है कि ,स्वर्ग में जाने के बाद वह पे चित्रगुप्त हामरे सब कामो हिसाब करते है ,फिर उसके बाद सीट अलोट करते है ,कि किसको स्वर्ग में जाना है ,और किसको नरक में .चित्र गुप्त जी ,अपना रजिस्टर खोलते है,सबसे पहले अटल जी का हिसाब किताब देखते है ।
चित्र गुप्त : अटल ,तुमने तो इंडिया को बहुत फील गूड कराया लेकिन सिर्फ अपनी कविताओं में ,कभी विहिप ,और कभी शिवसेना को कराया ,लेकिन भारत उदय नही हुआ ,खैर कोई बात नही ,तुने जो भी किया कुछ ठीक ही किया ,और अभी तक कुवारे हो ,चलो तुम स्वर्ग में जाओ ,वहा पे परिओं से तुमरा कौमार्य खतम हो जाएगा .जी लेना अपनी ज़िंदगी ।
अब बारी मनमोहन कि
चित्र गुप्त : मनमोहन ,तेरा हिसाब किताब तो बहुत गड़बड़ है .तुमने तो कभी कुछ बोला ही नही ,जो कुछ बोला सोनिया ने ही बोला ,उसने जैसा चाहा वैसा तुमसे कराया ,खैर ,तुम भी स्वर्ग में जाओ ,जी लेना अपनी ज़िंदगी ..अपनी तरह से ।
अब बारी लालू जी कि
चित्र गुप्त : लालू जी ,भाई साहब ,आप नरक में जाओ ,आपका हिसाब किताब बहुत गड़बड़ है ,हमारे रजिस्टर में सब बकाया है आपका ,चारा घोटाला ,गुंडा गर्दी , जेल ,पता नही क्या क्या ।
लालू जी बिफर गए ,गुस्से में बोले , ई का है चित्र गुप्त्वा ,साला धरती पे भी हमारा हिसाब किताब खराब था ,यह पे भी सुकून नही है ,हम नही मानेगे ,हमको भी स्वार्ग में भेजो ,लालोऊ अपनी जिद पे अड़ गए ..फिर चित्र गुप्त ने कहा ,ठीक है ,हम आप लोगो से कुछ प्रश्न पूछूंगा ,जो उत्तर दे देगा ,स्वर्ग में जाएगा ,और जो नही दे पायेगा ,नरक में !सब तैयार हो गए ।
चित्र गुप्त अटल से : अटल Boy माने ।
अटल : जी ,लड़का ।
चित्रग्प्त : Spelling ?
अटल : बी...ओ...वाई
चित्र गुप्त : सबाश !! पास हो गए ,स्वर्ग में जाओ ।
चित्र गुप्त मनमोहन सें : मनमोहन ,girl माने ?
मनमोहन : जी , लड़की
चित्रगुप्त : Spelling?
मनमोहन : G...I...R ..L
चित्र ग्पुत : शाबास !! पास हो गए स्वर्ग में जाओ ।
अब बारी लालू कि
चित्र गुप्त लालू से :
लालू ,CHEKOSLOWAAKIYA माने !!
लालू : ई चित्र गुप्त्वा ,उनसे लड़का लड़की ,हमसे चेकोस्लोवाकिया..ई बिल्कुल भी नही चलेगा ,जयादा मूद्वा खराब करेगा तो हम यह रैल्ली निकाल देंगे ...हम ये पच्छ्पात बिल्कुल भी नही मानेगे ..फिर से पूछो ।
चित्रग्पुत : लालू ,तुमरा ये नाटक नही चलेगा ,चलो तुमको एक चांस और देते है ।
चित्र गुप्त अटल से : अटल ,वह एक लड़का है ,ट्रांसलेशन करो !
अटल : HE IS A Boy !
चित्रगुप्त : शाबास !सबाश !! पास हो गए ,स्वर्ग में जाओ ।
चित्र गुप्त मनमोहन से : मनमोहन ,वह एक लड़की है ,ट्रांसलेशन करो ।
मनमोहन : SHE IS A girl।
चित्रगुप्त : शाबास !सबाश !! पास हो गए ,स्वर्ग में जाओ ।
चित्र गुप्त लालू से : लालू ,हरा पेड़ चर्र्र्र्र्र्र्र्र्रा से गिर गया ,ट्रांसलेशन करो ।
लालू : हे देखा , उनसे लड़का लड़की ,हमसे चर्र्र्रा ,पर्र्र्र्रा !!!बिल्कुल नही ,हमको तो तुम लोग फसा दिए ,जर्रूर ये बीपच्च्ही कि चाल है ,हम नही मानेगे ,एक मौका और चाहिए ,लेकिन इस बार पच्छापात बिल्कुल भी नही ।
चित्र गुप्त : ठीक लालू जी ,एक बार और चांस मिलेगा ,ये लास्ट चांस है ,
चित्र गुप्त अटल से : अटल ,भारत में आजादी कि जंग कि शुरुवात कब हुयी थी ?
अटल : जी ,१८५७ में!
चित्र गुप्त : शाबास !!!! पास हो गए ,स्वर्ग में जाओ !!!
चित्र गुप्त मनमोहन से : मनमोहन , आजादी कि जंग में लगभग कितने लोग शहीद हुए ?
मनमोहन : वही लगभग ,१९ ,२० हजार ।
चित्रगुप्त : शाबास !!!! बिल्कुल सही , पास हो गए... स्वर्ग में जाओ !!!
चित्र गुप्त लालू से :लालू!! तुम उन १९,२० हजार शहीदों के नाम बताओ ?
Tuesday, November 13, 2007
पार्टनर के सामने कपड़े उतारने से शर्माते हैं मर्द !
रिसर्च में पता चला है कि विज्ञापनों और फैशन मैग्जीनों में बॉडी की परफेक्ट शेप देखकर पुरुषों को भी उतनी ही शर्मिंदगी महसूस होती है, जितनी महिलाओं को।
तानिता के स्केल मैन्युफैक्चर्रस द्वारा यह सर्वे किया गया। सर्वे में शामिल 3000 पुरुषों में से 50 परसेंट ने खुद को मोटा बताया। हर दस में से एक पुरुष ने कहा कि वह अपनी चर्बी कम करने के लिए कॉस्मेटिक सर्जरी करवाना पसंद करेंगे। 72 परसेंट का कहना था कि जिम-ट्रिम शरीर देखकर उन्हें बुरा लगता है और यहां तक कि वे अपनी ढुलमुल फिजीक को लेकर असुरक्षित भी महसूस करते हैं।
लंदन के अखबार डेली मेल ने एसोसिएशन ऑफ फिटनेस इन्स्ट्रक्टर्स के प्रेजिडेंट ब्रेंडा मार्टिमोर के हवाले से लिखा है कि कुछ समय से महिलाओं में यह धारणा बन रही है कि परफेक्ट फिगर का मतलब है किसी पतंगे जैसा पतला होना। मार्टिमोर का कहना है कि ऐसा लगता है कि यह धारणा अब पुरुषों के बीच भी जगह बना रही है। वह कहते हैं कि बहुत सारे पुरुष जो अच्छे-खासे दिखते हैं, अब अपने आप को लेकर खुश नहीं हैं।
सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि पुरुषों ने शरीर को लेकर अपनी चिंतांओं का एक आसान हल भी खोज लिया है। यह हल है झूठ बोलना। हर 5 में से एक पुरुष ने माना कि वह अपनी कमर के साइज या वजन को लेकर झूठ बोलते हैं।
लो भैया ये भी आफत है ,मर्द के साथ.
Thursday, November 8, 2007
अपुन मानता है अपुन टपोरी है .
वजन ८० किल्लो और
5 1/ 2 फूट हाईट क्या ,
पूरा कसरत बोडी !!!
......अभी वो बोले तो ,
क्या है न अपुन को भी लाइफ में
सेटल होने का माँगता ,
इसीलिए ये विज्ञापन अपुन
पेपर में छाप रे ला है ...
अपुन मानता है अपुन टपोरी है ,
बहुत लोग का पुंगी बजायेला है मगर
क्या है ना बाप ,
अपुन का भी इज्ज़त है मार्किट में ! !!
अपुन को भी पब्लिक शादी -बियाह में बोलती है वह भी
इज्ज़त से !
साल का 5/६ पेटी तो अपुन आराम से कमा लेता है ...
बुरी आदत बोले तो दारु और बीडी , अभी दारु कोन
नही पीता - यार !!!!. अक्खा बड़ा बड़ा लोग अपुन लोग से
जास्ती चडा लेता है ...
अब छोकरी पुन् को ऐसा माँगता है ...
बोले तो एक दम झकास माल , पटाखा , एक दम
पटाखा ...
थोडा पड़ी लिखी होंगी तो चलेंगा
किओं के साला येः कभी कभी फॉर्म भरने के लिए
साला अपुन को 25 लोग का हाथ पैर जोड़ना पड़ता है ..
अपुन जो है न शादी के बाद एक
दम सुधर जायिंगा इमान से ...
अपुन का बच्चा लोग को अपुन पढा लिखा टपोरी
बनायिंगा ...
बोले तो टपोरी डॉक्टर ,टपोरी कंप्यूटर वाला ,टपोरी ब्लोगर और भी
भोत कुछ .........
माँ कसम शादी के बाद अपुन किसी भी चिकनी को लाईन
नही देंगा ...
देखो मामू अपुन को शादी के बाद में
कोई छोकरी कि फमिली का लफडा नही माँगता है ..
हाँ बोले तो कबाब में हड्डी नही बनने का क्या !
कोई साला बीच में आयेगा तो उसका गेम बजा
दालेंगा .
अभी ये सब अच्छा लगे तो अपुन को contact करने का
क्या !
पता है -
मुन्ना मोबाइल के पिच्छु ,
पप्पू पेजर का राईट हैण्ड , शान पट्टी नगर ,
हैरान गली No. 420,
परेशां रोड , भाई का एरिया .-३०३
ई -मेल : खूनखराबा@शोर्ट-शर्कित.कॉम
सभी भाई लोग को दिवाली कि शुभ कामना !!
Friday, November 2, 2007
अजब पागल सी लड़की है!!!!
अजब पागल सी लड़की है ,
मुझे ख़त मैं लिखती है ,
“मुझे तुम याद करते हो ?
तुम्हें मैं याद आती हूँ ?”
मेरी बातें सताती हैं
मेरी नींदें जगती हैं
मेरी आँखें रुलाती हैं
दिसम्बर के सुनहरी धुप में अब भी टहलते हो ?
किसी खामोश रस्ते से
कोई आवाज़ आती है ?
ठहरती शरद रातों में
तुम अब भी छत पे जाते हो ?
फलक के सब सितारों को
मेरी बातें सुनाते हो ?
किताबों से तुम्हारे इश्क में कोई कमी आई ?
या मेरी याद के शिद्दत से आंखों में नमी आई ?
अजब पागल सी लड़की है
मुझे हर ख़त में लिखती है .... . .........
जवाबन उस को लिखता हूँ ..
मेरी मसरूफियत देखो सुबह से शाम ऑफिस में
चिराग -ए -उमर जलता है
फिर उस के बाद दुनिया की
कई मजबूरियां पावो में में बेडी डाल रखती हैं
मुझे बे -फिक्र , चाहत से भरे सपने नहीं दिखते
टहलने , जागने , रोने की मोहलत नहीं मिलती
सितारों से मिले अरसा हुआ ..नाराज़ हों शायद
किताबों से मेरा रिश्ता अभी वैसे ही कायम है
फर्क इतना पड़ा है अब उन्हें अर्से में पढता हूँ
तुम्हें किस ने कहा पगली तुम्हें में याद करता हूँ
के मैं खुद को भुलाने की मुसलसल जुस्तजू में हूँ
तुम्हें ना याद आने की मुसलसल जुस्तजू में हूँ
मगर यह जुस्तजू मेरी बहुत नाकाम रहती है
मेरे दिन रात में अब भी तुम्हारी शाम रहती है
मेरे लफ्जों कि हर माला तुम्हारे नाम रहती है
तुम्हें किस ने कहा पगली तुम्हें मैं याद करता हूँ
पुरानी बात है जो लोग अक्सर गुनगुनाते हैं
उन्हें हम याद करते हैं जिन्हें हम भूल जाते हैं
अजब पागल सी लड़की है
मेरी मसरूफियत देखो
तुम्हें दिल से भूलूं तो तुम्हारी याद आये ना
तुम्हें दिल भुलाने की मुझे फुरसत नहीं मिलती
और इस मसरूफ जीवन में
तुम्हरे ख़त का इक्क जुमला
“तुम्हें मैं याद आती हूँ ?”
मेरी चाहत कि शिद्दत में कमी होने नहीं देता
बहुत रातें जगाता है मुझे सोने नहीं देता
सो अगली बार अपने ख़त में यह जुमला नहीं लिखना
अजब पागल सी लड़की है मुझे फिर भी ये लिखती है
मुझे तुम याद करते हो तुम्हें मैं याद आती हूँ ????????????????????????
Tuesday, October 23, 2007
मेरा ताजमहल
अपनी मुहब्बत को जिंदा रखने के लिए ,शाहजहा ने,
एक ताजमहल बनवाया था ,
हालाकि मैं शाह्ज़हा नही हूँ ,फिर भी !!
एक ताजमहल बनवाऊंगा ,
जो मेरे दर्द का प्रतीक होगा ,
जिसे बनाने के लिए ,
मेरे पास दौलत का नही ,निराश इच्छाओं का असीमित खजाना है ।
जो संगमरमर के टुकडों से नही ,मेरे दिल के टुकडों से तैयार होगा ,
जिसका रंग सफ़ेद संगमरमर कि तरह नही ,मेरे खून कि तरह लाल होगा ।
उसके सामने जख्मो से निकली ,
तुम्हारी यादों का एक बाग़ होगा ,
और उसकी खूबसूरती के लिए ,उसके किनारे -२
मेरे आशुओं का दरिया बहेगा ।
मेरे दर्द का ताजमहल ,किसी आसमानी रोशनी से नही ,
मेरे दर्द और यादों कि रोशनी से चमका करेगा ।
और जिसे देखने के लिए ,हर हसीं रात में ,
दिल जलो ,बे -कशों का हुजूम लगा करेगा ।
जिसके ठीक सामने होगा ,तुम्हारी यादों का एक किला ,
जिसमे मेरी मुहब्बत के साथ ,मेरे जज्बात भी कैद रहेंगे ।
और जिसके झरोखों से मेरी मुहब्बत ,मेरे जज्ज्बात ,
मेरी इस कारीगिरी को झाँका करेंगे ।
मैं हर रात उस किले ,में ,अपनी मुरादों का एक दीप जलाऊंगा ,
अपनी बेकाशी का एक गीत सुनाऊँगा ,
के तू मेरी मुमताज़ है ...रहेगी ...शायद उम्र भर ।
गर्दिशे हालात से ,जब थक जाऊंगा चलते -२ ,
अपनी ही असफलताओं से हार जाऊँगा लड़ते -२ ।
तो हे ,जमाने के सताए लोगो ,
दफना देना मुझे !!
मेरे ही दर्द के ताजमहल के सामने ,
और दफ़न हो जाऊंगा मैं ...........
अपनी सलाबों के साथ ,लिपटा हुआ कफ़न में ,
बस ! यही हसरत लिए कि ,
काश ! तू मेरी मुमताज़ और मैं तेरा शाह्ज़हा होता !!!!
Saturday, October 13, 2007
हमारे और तुम्हारे बीच
कैसे बताऊँ ?
ना व्यक्त होता है ना अभिव्यक्त
ना लिख कर बता सकता हूँ ,ना इशारों से ,
बस !
जिस दिन वर्षा हो ,और झाडियाँ थमें ,
जरा कमरे से निकल ,आकाश कि ओर देख लेना ,
शायद ,इन्द्रधनुष निकला हो ,
सप्त्रंगी !!
वही देगा उत्तर ,तुम्हारे प्रश्न का
कि
कितने रिश्ते संलिप्त है
हमारे और तुम्हारे बीच .

