उदास शामों की सिसकियों में ..
कभी जो मेरी आवाज़ सुनना ,
तो बीते लम्हों को याद कर के ,
इन्ही फिजाओं मे लौट आना ..
तुम आया करते थे खवाब बन कर ,
कभी महकता गुलाब बन कर ,
मैं खुश्क होंठों से जब पुकारूँ ,
इन अदाओं मे लौट आना …
मेरी वफाओं को पास रखना ,
मेरी दुआओं को पास रखना ,
मै खली हाथों को जब उठाऊँ ,
मेरी दुआओं मे लौट आना
Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts
Saturday, May 23, 2009
Wednesday, December 19, 2007
जरा सी बात है मुँह से निकल न जाये कही
नजर नवाज नज़ारा बदल न जाये कही।
जरा सी बात है मुँह से निकल न जाये कही,
वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है ,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाये कही।
यों मुझको खुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन ,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाये कही ।
तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है ,
तमाम उम्र नशे में न निकल जाये कही,
कभी मचान पे चढ़ने कि आरजू उभरी ,
कभी ये डर के ये सीढ़ी फिसल न जाये कहीं ।
ये लोग होमो हवन में यकीन रखते है
चलो यहाँ से हाथ जल न जाये कही । ।
हिन्दी
जरा सी बात है मुँह से निकल न जाये कही,
वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है ,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाये कही।
यों मुझको खुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन ,
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाये कही ।
तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है ,
तमाम उम्र नशे में न निकल जाये कही,
कभी मचान पे चढ़ने कि आरजू उभरी ,
कभी ये डर के ये सीढ़ी फिसल न जाये कहीं ।
ये लोग होमो हवन में यकीन रखते है
चलो यहाँ से हाथ जल न जाये कही । ।
हिन्दी
Tuesday, November 20, 2007
कशमकश
ढलती शाम तुमको देखा ,चहलकदमी करते हुए !
कदम तेरे बढ़ रहे थे ,यूं कशमकश में फँसे हुए ,
अजब थी हालत थी तेरी ,जैसे कि बस में न हो दिल तेरा ,
कभी गुमसुम सी लगती थी तुम,कभी मायूस सी ,
चेहरे पे लटकती ये बेपरवाह लटें ,कितनी मासूम हो तुम !!!
सोचता रह रात भर ,कि पूछूं परेशानी तुम्हारी ,
पर डर गया इस डर कि कही और ना परेशान कर दूं तुम्हे ,
इस भोले से चेहरे पर अच्छी लगती है ,लकीरे सिर्फ मुस्कराहट कि ,
अपनी रंजिशे ,मुश्किलें ,हमे दे दो ,
लेकिन खुश रहा करो ....मेरे लिए !!
पहले कि तरह ..................................!!!
कदम तेरे बढ़ रहे थे ,यूं कशमकश में फँसे हुए ,
अजब थी हालत थी तेरी ,जैसे कि बस में न हो दिल तेरा ,
कभी गुमसुम सी लगती थी तुम,कभी मायूस सी ,
चेहरे पे लटकती ये बेपरवाह लटें ,कितनी मासूम हो तुम !!!
सोचता रह रात भर ,कि पूछूं परेशानी तुम्हारी ,
पर डर गया इस डर कि कही और ना परेशान कर दूं तुम्हे ,
इस भोले से चेहरे पर अच्छी लगती है ,लकीरे सिर्फ मुस्कराहट कि ,
अपनी रंजिशे ,मुश्किलें ,हमे दे दो ,
लेकिन खुश रहा करो ....मेरे लिए !!
पहले कि तरह ..................................!!!
Tuesday, October 23, 2007
मेरा ताजमहल
मेरा ताज महल मेरे कालेज के दिनों में मेरे मित्रो द्वारा बहुत पसंद किया जाता था .आज अपनी डायरी के पन्नों को बहुत दिनों बाद पलटा तो ये रचना निगाहों के सामने पड़ी ,सोचा कि इसको आप लोगो को भी सुनाऊं ....
अपनी मुहब्बत को जिंदा रखने के लिए ,शाहजहा ने,
एक ताजमहल बनवाया था ,
हालाकि मैं शाह्ज़हा नही हूँ ,फिर भी !!
एक ताजमहल बनवाऊंगा ,
जो मेरे दर्द का प्रतीक होगा ,
जिसे बनाने के लिए ,
मेरे पास दौलत का नही ,निराश इच्छाओं का असीमित खजाना है ।
जो संगमरमर के टुकडों से नही ,मेरे दिल के टुकडों से तैयार होगा ,
जिसका रंग सफ़ेद संगमरमर कि तरह नही ,मेरे खून कि तरह लाल होगा ।
उसके सामने जख्मो से निकली ,
तुम्हारी यादों का एक बाग़ होगा ,
और उसकी खूबसूरती के लिए ,उसके किनारे -२
मेरे आशुओं का दरिया बहेगा ।
मेरे दर्द का ताजमहल ,किसी आसमानी रोशनी से नही ,
मेरे दर्द और यादों कि रोशनी से चमका करेगा ।
और जिसे देखने के लिए ,हर हसीं रात में ,
दिल जलो ,बे -कशों का हुजूम लगा करेगा ।
जिसके ठीक सामने होगा ,तुम्हारी यादों का एक किला ,
जिसमे मेरी मुहब्बत के साथ ,मेरे जज्बात भी कैद रहेंगे ।
और जिसके झरोखों से मेरी मुहब्बत ,मेरे जज्ज्बात ,
मेरी इस कारीगिरी को झाँका करेंगे ।
मैं हर रात उस किले ,में ,अपनी मुरादों का एक दीप जलाऊंगा ,
अपनी बेकाशी का एक गीत सुनाऊँगा ,
के तू मेरी मुमताज़ है ...रहेगी ...शायद उम्र भर ।
गर्दिशे हालात से ,जब थक जाऊंगा चलते -२ ,
अपनी ही असफलताओं से हार जाऊँगा लड़ते -२ ।
तो हे ,जमाने के सताए लोगो ,
दफना देना मुझे !!
मेरे ही दर्द के ताजमहल के सामने ,
और दफ़न हो जाऊंगा मैं ...........
अपनी सलाबों के साथ ,लिपटा हुआ कफ़न में ,
बस ! यही हसरत लिए कि ,
काश ! तू मेरी मुमताज़ और मैं तेरा शाह्ज़हा होता !!!!
अपनी मुहब्बत को जिंदा रखने के लिए ,शाहजहा ने,
एक ताजमहल बनवाया था ,
हालाकि मैं शाह्ज़हा नही हूँ ,फिर भी !!
एक ताजमहल बनवाऊंगा ,
जो मेरे दर्द का प्रतीक होगा ,
जिसे बनाने के लिए ,
मेरे पास दौलत का नही ,निराश इच्छाओं का असीमित खजाना है ।
जो संगमरमर के टुकडों से नही ,मेरे दिल के टुकडों से तैयार होगा ,
जिसका रंग सफ़ेद संगमरमर कि तरह नही ,मेरे खून कि तरह लाल होगा ।
उसके सामने जख्मो से निकली ,
तुम्हारी यादों का एक बाग़ होगा ,
और उसकी खूबसूरती के लिए ,उसके किनारे -२
मेरे आशुओं का दरिया बहेगा ।
मेरे दर्द का ताजमहल ,किसी आसमानी रोशनी से नही ,
मेरे दर्द और यादों कि रोशनी से चमका करेगा ।
और जिसे देखने के लिए ,हर हसीं रात में ,
दिल जलो ,बे -कशों का हुजूम लगा करेगा ।
जिसके ठीक सामने होगा ,तुम्हारी यादों का एक किला ,
जिसमे मेरी मुहब्बत के साथ ,मेरे जज्बात भी कैद रहेंगे ।
और जिसके झरोखों से मेरी मुहब्बत ,मेरे जज्ज्बात ,
मेरी इस कारीगिरी को झाँका करेंगे ।
मैं हर रात उस किले ,में ,अपनी मुरादों का एक दीप जलाऊंगा ,
अपनी बेकाशी का एक गीत सुनाऊँगा ,
के तू मेरी मुमताज़ है ...रहेगी ...शायद उम्र भर ।
गर्दिशे हालात से ,जब थक जाऊंगा चलते -२ ,
अपनी ही असफलताओं से हार जाऊँगा लड़ते -२ ।
तो हे ,जमाने के सताए लोगो ,
दफना देना मुझे !!
मेरे ही दर्द के ताजमहल के सामने ,
और दफ़न हो जाऊंगा मैं ...........
अपनी सलाबों के साथ ,लिपटा हुआ कफ़न में ,
बस ! यही हसरत लिए कि ,
काश ! तू मेरी मुमताज़ और मैं तेरा शाह्ज़हा होता !!!!
Saturday, October 13, 2007
हमारे और तुम्हारे बीच
तुमने लिख पूछा है !कैसा है मेरा प्यार तुम्हारे लिए ,
कैसे बताऊँ ?
ना व्यक्त होता है ना अभिव्यक्त
ना लिख कर बता सकता हूँ ,ना इशारों से ,
बस !
जिस दिन वर्षा हो ,और झाडियाँ थमें ,
जरा कमरे से निकल ,आकाश कि ओर देख लेना ,
शायद ,इन्द्रधनुष निकला हो ,
सप्त्रंगी !!
वही देगा उत्तर ,तुम्हारे प्रश्न का
कि
कितने रिश्ते संलिप्त है
हमारे और तुम्हारे बीच .
कैसे बताऊँ ?
ना व्यक्त होता है ना अभिव्यक्त
ना लिख कर बता सकता हूँ ,ना इशारों से ,
बस !
जिस दिन वर्षा हो ,और झाडियाँ थमें ,
जरा कमरे से निकल ,आकाश कि ओर देख लेना ,
शायद ,इन्द्रधनुष निकला हो ,
सप्त्रंगी !!
वही देगा उत्तर ,तुम्हारे प्रश्न का
कि
कितने रिश्ते संलिप्त है
हमारे और तुम्हारे बीच .
Subscribe to:
Comments (Atom)
