Saturday, August 8, 2009

अच्छा लगता है वो मगर कितना



















भूल जाता हूँ मिलने वालों को
खुद से फिरता हूँ बेखबर कितना

उसने आबाद की है तन्हाई
वरना सुनसान था ये घर कितना

कौन अब आरजू करे उसकी
अब दुआ मैं भी है असर कितना

वो मुझे याद कर के सोता है
उस को लगता है खुद से दर कितना

आदतें सब बुरी हैं यारों उसकी
अच्छा लगता है वो मगर कितना

3 comments:

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

कौन अब आरजू करे उसकी
अब दुआ मैं भी है असर कितना

बहुत सुन्दर रचना .

shivashila said...

"आदतें सब बुरी हैं यारों उसकी
अच्छा लगता है वो मगर कितना"
काफ़ी सुन्दर रचना.

aa said...

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