
भूल जाता हूँ मिलने वालों को
खुद से फिरता हूँ बेखबर कितना
उसने आबाद की है तन्हाई
वरना सुनसान था ये घर कितना
कौन अब आरजू करे उसकी
अब दुआ मैं भी है असर कितना
वो मुझे याद कर के सोता है
उस को लगता है खुद से दर कितना
आदतें सब बुरी हैं यारों उसकी
अच्छा लगता है वो मगर कितना
2 comments:
कौन अब आरजू करे उसकी
अब दुआ मैं भी है असर कितना
बहुत सुन्दर रचना .
"आदतें सब बुरी हैं यारों उसकी
अच्छा लगता है वो मगर कितना"
काफ़ी सुन्दर रचना.
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