Saturday, May 23, 2009

सुनो!! तुम लौट आना

उदास शामों की सिसकियों में ..

कभी जो मेरी आवाज़ सुनना ,
तो बीते लम्हों को याद कर के ,
इन्ही फिजाओं मे लौट आना ..

तुम आया करते थे खवाब बन कर ,
कभी महकता गुलाब बन कर ,
मैं खुश्क होंठों से जब पुकारूँ ,
इन अदाओं मे लौट आना …

मेरी वफाओं को पास रखना ,
मेरी दुआओं को पास रखना ,
मै खली हाथों को जब उठाऊँ ,

मेरी दुआओं मे लौट आना

4 comments:

शारदा अरोरा said...

तुम आया करते थे खवाब बन कर ,
कभी महकता गुलाब बन कर
मै खली हाथों को जब उठाऊँ ,
मेरी दुआओं मे लौट आना
बहुत अच्छी पंक्तियाँ
खली को खाली लिख लें |

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

सुन्दर! शाम तो घर लौटने के लिये ही होती है!

MANVINDER BHIMBER said...

तुम आया करते थे खवाब बन कर ,
कभी महकता गुलाब बन कर ,
मैं खुश्क होंठों से जब पुकारूँ ,
इन अदाओं मे लौट आना …
बहुत sunder लिखा है ...

shivashila said...

जाने वाले तो नहीं आते,
आती हैं केवल यादें उनकी,
ख्वाब तो केवल ख्वाब है,
हकी़कत में न चाह कर इनकी.